Wednesday, September 22, 2010

मैं अब नहीं तेरी सजनी

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आज शाम वो मिलने आयीं
बोली सुन साजन मेरे
धर्म अलग है मेरा तेरा
संभव नहीं अग्नि- फेरे

बात सिर्फ जो धर्म कि होती
मैं पूजती इश्वर सब तेरे
बहुत अलग हैं हम तुम साजन
कहते शुभचिंतक मेरे

मैं हूँ चुप चुप तू बडबोला
नहीं मिलती जोड़ी अपनी
छोड़ मोह ये प्यार का अब तू
मैं अब नहीं तेरी सजनी

तू लम्बा पतला और दुबला
और मैं ठहरी मोटी सी
लोग हसेंगे हम पर सारे
हाय जोड़ी है ये कैसी

मैं हूँ सुन्दर गोरी बाला
और तुम काले दिखते हो
हम दिल्ली वालों के आगे
बिहारी तुम नहीं टिकते हो

मैं बोलूँ वो जाट की भाषा
मस्त सुनायी देती है
तुम अपनी भाषा बोलो लगे
मार पिटाई होती है

मैं मुंबई में रहने वाली
दिल्ली से पढ़कर आयी
तुम जो ठहरे गाँव-गंवारे
नागपूर तुमको भायी

मैं सोती हूँ ठाठ बाठ से
उठती हूँ मैं आठ बजे
गाँव के जैसी सोच तुम्हारी
उठते हो तुम पांच बजे

हाय बिचारी पिस जाऊंगी
तुमसे मैं लेकर फेरे
गलती हो गयी माफ़ करो
की नैन-मटक्का संग तेरे

दिल टूटा है मेरा भैय्या
गीता पढने हूँ बैठा
कृष्ण की थी सौ सौ बालाएं
मुझे एक मिला वो भी झूठा

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